हैरानी? परेशानी? दुख? किस बात के लिए??
अच्छा गोरखपुर.. हाँ बात तो ठीक है.. मासूम मरे हैं.. संवेदनाएं जता देता हूँ।
वैसे इंदौर में भी 17 मरे थे, ऐसे ही.. तब भी संवेदनाएं जताई थीं..तो यहां भी जता देता हूँ..बाकि क्या फर्क पड़ता है.. 25-30 घंटे बाद फिर वही मुर्दापन..!!


ऐसी मौतें हमारी नियति बन चुकी हैं, और इन पर हम बिल्कुल मशीनों की तरह प्रतिक्रिया देने लगे हैं।

जिनकी संवेदनाएं मर गई हैं, उनका काम ज्यादा अच्छा है.. कुछ लेना-देना नहीं..चुपचाप टीवी देखके टेंशन फ्री हैं..

क्योंकि जो संवेदनाएं जता रहे हैं, उन्होंने क्या बदल दिया? इंदौर वाले केस में भी तो जताई थी संवेदना..कुछ फायदा हुआ क्या..?? लेकिन जताते रहिये संवेदनाएं..
..पर सोचियेगा कि क्या ये संवेदनाएं वाकई ईमानदार है, या सिर्फ किसी योगी/मोदी को टारगेट करने तक ही सीमित हैं?

..खैर, हम बुंदेलखंड से हैं.. अस्पतालों द्वारा लापरवाही की ऐसी घटनाएं हमारी नियति बन चुकी हैं.. इसीलिए हमारी संवेदनाएं मर चुकी हैं। अब ज्यादा फ़र्क नहीं पड़ता..!!

अस्पतालों की लापरवाही से अचानक 60-65 मौतें तो नहीं लेकिन 2-4 मौते हर हफ्ते होती ही होंगी। चूंकि मौतों को भी अब आलू-टमाटर की तरह गिना जाता है, इसीलिए हम भी गिनती की कोशिश में हैं।
आप बुंदेलखंड क्षेत्र के किसी भी सरकारी अस्पताल में चले जाइये, आपको घिन आएगी। स्वच्छता सुविधाएं निहायत ही घटिया किस्म की हैं।
डॉक्टर, स्टाफ, उपकरणों की बेहद कमी है। कहीं 108 एम्बुलेंस नहीं है तो कहीं अस्पताल में बेड न होने के कारण महिला जमीन पे प्रसव करने के लिए विवश है।
ग्रामीण मजबूर हैं झोलाछाप इलाज कराने के लिए। डॉक्टर प्राइवेट प्रैक्टिस में व्यस्त हैं और गांवों में काम करने के लिए तैयार नहीं हैं।

अभी 5-6 दिन पहले ही छतरपुर जिले के बक्सवाहा में 5 वर्षीय बालक ‘गजेंद्र अहिरवार’ की अस्पताल में मौत के बाद उसका शव ले जाने के लिए अस्पताल द्वारा वाहन उपलब्ध नहीं कराया गया।
पिछले साल दमोह कलेक्टर ‘श्रीनिवास शर्मा’ की माँ के निधन के बाद उन्होंने खुद इसके लिए अस्पताल प्रबंधन को दोषी ठहराया।
जब कलेक्टर को ऐसा कहना पड़ रहा है, तो बुंदेलखंड की गरीब, शोषित, कुपोषित जनता का तो आप अंदाजा लगा ही सकते हैं, कि उनके लिए स्वास्थ्य सुविधाएं किस स्तर की होगीं। एक और बात पिछले 15 सालों से मप्र में ‘विकासवादियों’ की सरकार है, और सरकार में 3 महत्वपूर्ण मंत्री बुंदेलखंड से हैं। इसके बाद भी हालात आप खुद जाके देख सकते हैं।
मुझे लगता है कि सुधार की शुरूआत शासन के स्तर से नहीं अपितु डॉक्टर के स्तर से होनी चाहिए। सबसे पहले डॉक्टरों की प्राइवेट प्रैक्टिस पर लगाम लगनी ही चाहिए। उसके बाद दूसरे सुधार।

रही बात संवेदना की तो आप संवेदना दिखा चुके हैं, सरकार संवेदनहीनता दिखा चुकी है। अब आगे क्या??
क्या आप सरकार से ये सवाल पूछेंगे कि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए आप सरकार क्या करेगी?
…या फिर वही गाय-चाय, टैंक-रैंक, रोमियो-जूलियट, हिन्दू-मुस्लिम, वीडियोग्राफी में उलझे रहेंगे?
..सच ये है कि हम साइलेंट मेजोरिटी हैं.. संवेदनाएं जताने के अलावा हम कुछ नहीं कर सकेंंगे। कम से कम तब तक तो नहीं जब तक बात खुद पे न आ जाये..!!

इसीलिए ये शेर शायद हमारे लिए ही कहा गया है-
“जलते घर को देखने वालों, फूस का छप्पर आपका है
पीछे आपके तेज हवा है, आगे मुक़द्दर आपका है
उसके कत्ल पे मैं भी चुप था मेरा नंबर अब आया
मेरे क़त्ल पे आप भी चुप हैं अगला नंबर आपका है..!!”

– विनीत जैन ‘अनहद’

2 Replies to “गोरखपुर प्रकरण और बुंदेलखंड : स्वास्थ्य सुविधाएं”

Leave a Reply