गौरी लंकेश प्रकरण : मीडिया की ‘अनुचित’ भूमिका

गौरी लंकेश हत्याकांड के बाद स्तब्ध हूँ। होना ही चाहिए, हर आदमी को होना चाहिए… चाहे वो वामपंथी हो, दक्षिणपंथी हो या मध्यमार्गी।
लेकिन ये आलेेेख गौरी की हत्या के बहाने कुछ और पहलुओं पे विचार करने के लिए लिख रहा हूँ।
मैं पहले कई बार कह चुका हूँ कि हम सबकी संवेदनाएं मर रही हैं। अथवा ये भी कहा जा सकता है कि संवेदनाएं मार दी गई हैं।
चाहे गोरखपुर में बच्चों की मौत हो या खतौली में ट्रेन हादसा; गुजरात में स्वाइन फ्लू से लोगों की मौत हो या बिहार और पूर्वोत्तर में बाढ़ से लोगों की मौत; मप्र में कुपोषण से बच्चों की मौत हो या बुंदेलखंड-विदर्भ में किसानों की आत्महत्या। हम हर मुद्दे पर सरकारों और विरोधों विचारधाराओं को कोसना शुरू कर देते हैं।
चूंकि हमने सरकार को चुना है, और जिम्मेदारियां अंततः सरकार की ही हैं इसीलिए सरकार को तो घेरा ही जाना चाहिए। लेकिन इस बीच बड़ा मानवीय ह्रास ये हुआ है कि किसी भी कारण से हुई मौतें अब हमें झकझोरती नहीं हैं। अब ये मौतें हमारे लिए ‘अखबारों की हेडलाइन’ और ‘प्राइम टाइम के न्यूज़ आइटम’ से अधिक की हैसियत नहीं रखतीं।
मेरे गांव के एक दादाजी बताते हैं कि उनके समय में यदि किसी दुर्घटना में 10 मौतें भी हो जाती थीं तो सारे देश में शोकवत् माहौल हो जाता था। लेकिन अब ऐसी संवेदना विरली ही है।
संवेदनहीनता का उदाहरण हाल ही में गौरी लंकेश प्रकरण में देखने को भी मिला। एक होनहार और निडर महिला पत्रकार की निर्मम हत्या के बाद इस मुद्दे को दो विचारधाराओं की लड़ाई में तब्दील कर दिया गया।
बहुत सारे पत्रकार और न्यूज़ चैनल अचानक से कैंडल मार्च निकालकर गौरी की हत्या के विरोध में प्रोटेस्ट करने लगे। इसमें प्रोटेस्ट करना बुरा पहलू नहीं है, एक ज़िंदा समाज की निशानी होती ही यही है कि वो ‘हर ग़लत चीज़’ का विरोध करे। लेकिन इस विरोध को सीधे तौर पे इस तरह से निरूपित किया गया कि चूंकि “गौरी लंकेश बीजेपी/उससे जुड़े संगठनों के ख़िलाफ़ लिखती थीं, इसीलिए उनकी हत्या इसी पार्टी/इससे जुड़े संगठनो द्वारा कराई गई।” एक और बुरी बात हुई इस प्रोटेस्ट में कि रिपब्लिक टीवी के एक पत्रकार को भगा दिया गया। ऐसे में सवाल उठना जायज़ है कि मीडिया की जिस स्वतंत्रता के नाम पर आप इकट्ठे हुए थे, क्या वाकई में वो अर्थपूर्ण रह गई?
इस मामले में और भी बुरी भूमिका दक्षिणपंथी विचारधारा से जुड़े लोगों ने निभाई। इन्होंने महिला पत्रकार की निर्मम हत्या को उचित ठहरा दिया। सोशल मीडिया पर गौरी को ‘कुतिया’ कहा गया, उन्हें ईसाई साबित करने की कोशिश भी की गई। वहीं कुछ लोगों ने इसमें वामपंथी संगठनों को जिम्मेदार ठहरा दिया।
इन दोनों विचारधाराओं के चरम टकराव के कारण किसी भी मीडिया हाउस से ये सवाल नहीं उठाया गया कि क्या ये राज्य की कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी नहीं है, कि उसके नागरिक सुरक्षित रहें?
…लेकिन नहीं..!! “लॉ & आर्डर” पर कोई बात ही नहीं हुई। सारे मीडिया हाउस अपनी-अपनी पसंद के अनुसार गौरी की हत्या के लिए दक्षिणपंथ/वामपंथ को जिम्मेदार ठहराने लगे.. बिना किसी प्रमाण के। आखिर क्यों? मीडिया क्या अब न्यायपालिका भी हो गया है? यदि मीडिया का आधार गौरी का ‘लेखन’ था, तो यह उल्लेखनीय है कि वे उग्र दक्षिणपंथ के खिलाफ तो लिखती ही थीं, कर्नाटक की कांग्रेस सरकार और नक्सलियों के खिलाफ भी लिखा करती थीं। ऐसे में बिना किसी जाँच-पड़ताल के किस आधार पर किसी विचारधारा विशेष पर हत्या की जिम्मेदारी थोप दी गई?
आम जनता की सबसे बड़ी समस्या यह है कि वैकल्पिक मीडिया के अभाव में वह मजबूर है ग़लत/पैड खबरें देखने के लिए। वह इसी मुख्य धारा के मीडिया से देखे-सुने पर अपना मत बना लेती है। सोशल मीडिया पर भी प्रोपगेंडा फैलाया जा रहा है। पक्ष-विपक्ष दोनों के द्वारा… आप चाहें तो इस संबंध में हाल के दिनों में सत्ता पक्ष और विपक्ष के आईटी सेल के बजट में हुई बढ़ोत्तरी के आंकड़े देख सकते हैं। ऐसी स्थिति में यह ज़रूरी हो गया है कि आम जनता स्वयं जागरूक बनें और पक्ष/विपक्ष की जिम्मेदारी सुनिश्चित करें।
पुनःश्च, विचारधाराओं ने हमें मुर्दा बना दिया है, और मुर्दों में संवेदना नहीं होती। हम सब बस एक मशीन की तरह हो गए हैं, जो मीडिया के निर्देशों के अनुसार चलती रहती है। मीडिया हमारा नियंत्रक हो रहा है, वह फैसले भी सुना रहा है, वह जनमत भी निर्धारित कर रहा है और हमारी अपनी खुद की समझ पर ताला भी डाल रहा है।
दुःख इस बात का है कि अब मौतों पर हमारी आंखों में आंसू नहीं होते। गौरी लंकेश की हत्या तो फिर भी मुख्य मीडिया में जगह पा पाई है, लेकिन गांव/कस्बों/शहरों के स्तर पे ऐसे कई पत्रकार हैं, जो विभिन्न रूपों में प्रताड़ित होते हैं। क्या उनकी खबर अखबारों की सुर्खियों से आगे बढ़ पाती है?
वास्तविक अर्थों में अब हमें आवश्यकता है, राजनीति से परे कारणों के मूल तक जाने की। हमें ज़रूरत है यह सुनिश्चित करना कि फिर कोई गौरी लंकेश न मरे, और यही उन्हें सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
अतः इस लेख के माध्यम से मेरा निवेदन है आप सबसे कि नफ़रत की राजनीति से ऊपर उठकर जागरुक नागरिक बनें। अब ‘मुआवजों’ और ‘ईनामों’ की नहीं बल्कि ‘इंतजामों’ की बात करें। अपनी आंखों में संवेदना और ईमान के आंसू भरें और सवाल करें अपनी सरकारों से कि ” क्या उन्होंने यह सुनिश्चित किया है कि फिर कोई गौरी लंकेश नहीं मरेगी..??”

हमेशा याद रखिये –
“उसके क़त्ल पे मैं भी चुप था, मेरा नंबर अब आया,
मेरे क़त्ल पे आप भी चुप हैं, अगला नंबर आपका है..!!”

विनीत जैन ‘अनहद’

तीन तलाक महिलाओ की जीत…?

टीवी शुरू करने पर कुछ महिलाओं को मिठाई बाँटते देखा, बुरका पहने महिलाओं को कम ही मौकों पर इस तरह खुल कर ख़ुशी मनाते देखा है।
चलिए तीन तलाक पर फैसला आ ही गया, परन्तु समझ नहीं आ रहा है तीन तलाक पर फैसला कहूँ या तुरंत तलाक पर फैसला….

 

फैसले को मोटे-मोटे तौर पर पढ़ने से यह समझ आ गया कि फैसले का आधार पुरुष और महिलाओ में असमान वितरित अधिकार नहीं था, बल्कि तीन तलाक को एक बार में ही दे देने को अमानवीय करार देकर फैसला दिया गया था !

 

मैं इसे दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र की जीत मान रहा था , दिल किया इसका इतिहास भी तलाशूं , खैर जो सामने आया वो मज़ेदार था। 21 इस्लामिक मुल्को में इसे गैर क़ानूनी किया जा चुका है। सबसे पहले मिस्त्र ने, जब हम आजाद भी नहीं हुए थे तब से इसको बंद कर दिया था और तो और हमारे पिछड़े हुए पडोसी ने भी इसको 1961 में नेहरु जी जैसे लिबरल के दौर में ही अस्वीकार कर दिया था !
ये जीत है या महज एक शुरुआत ?? ….पता नहीं !
पहले मैं इस फैसले का स्वागत कर लेता हूँ, और मैं इसको महिलाओ के मंदिर में प्रवेश के बाद की कड़ी के तौर पर देखूंगा ( ऐसा करने से शायद आप लोग मुझे धर्मनिरपेक्ष मान लेंगे 😛 )

 

एक और जानकारी जो ध्यान में आ गयी, उसे share किये चलता हूँ। जिन 6 महिलाओ ने इस “पाप” के खिलाफ बीड़ा उठाया था, उनमें से एक महिला को शादी और 2 बच्चो के बाद छोड़ दिया गया, फिर से “हलाल” कर के अपनाया गया तथा फिर से 2 और बच्चो के बाद (Total 4,समझने में आसान कर देता हूँ ) छोड दिया जाता है। वैसे हमे खास फर्क नही पड़ना हैं, हम अपने-अपने टीवी चैनलों और नेताओं की व्यख्या को देख कर अपने अंतिम विचार बना लेंगे !

 

चलिए तीन तलाक पर आगे बढते हैं.. सरकार ने लगभग साफ़ कर दिया है कि कानून बनाने की जरुरत नहीं हैं और इसके लिए IPC काफी हैं (वैसे SC के फैसले पर सरकार को बधाई पूरी मिल रही है 😀 ) रही बात इसको अमल करने की तो इसको अमल में लाने का काम भी उन्ही मौलवियों और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के पास है, जो आज तक इस प्रथा से महिलाओं को बचाए हुआ था..!!

 

 

 

वैसे संविधान की बारीकियों और क़ानूनी चाल बाजियों से परे कुछ “सक्रिय” महिलायें इस फैसले भर को इंसाफ मान चुकी हैं, उन्हें आगे कुछ नहीं चाहिए !
बहुत ध्यान से पढने और समझने के बाद पता लगा कि शरियत इंसानों द्वारा ही बनाया गया कानून हैं और इसमें बदलाव लाये जा सकते हैं। “ईश्वरीय” कानून “पवित्र कुरान” ही है !
अब उम्मीद हैं तीन तलाक की तरह Owner Killing, बहु विवाह, हलाला को भी चुनावी मुद्दा बनाया जायेगा और SC में मामले को जैसे-तैसे पंहुचा दिया जायेगा…फिर टकटकी लगा कर सब राम (SC) भरोसे छोड़ दीजिएगा….

 

 

“अब तक ये कुप्रथा क्यों थी ?”
क्योंकि किसी ने आज तक मुस्लिम महिलाओ को वोट बैंक की तरह देखा ही नहीं.. जब “नज़र” पड़ी तो नतीजे आप के सामने हैं।
जाने दीजिये स्वागत करना और निंदा करना हमारे DNA में शामिल हो गया हैं.. इसीलिए दिल खोल के स्वागत करिए वरना क्या पता हमें भी नेशनलिस्ट होने का सर्टिफिकेट मिलने में दिक्कत हो जाये ….

First General Election Facts…

  • first general election in India, held over a four-month period (Oct 15, 1951, to Feb 21, 1952)
  • each candidate was allotted a separate ballot box at polling booths, differently colored, on which each candidate’s name and election symbol was labelled
  • The ballot papers were printed at the Government of India Security Press at Nashik, where the Indian currency notes were also printed.
  • 14 National Parties , Total 53 Parties participated.
  • At that time, there were 314 constituencies with one seat, 86 with two seats and one with three seats (Interesting :P).
  • B. R. Ambedkar was defeated in the Bombay (North Central) ,Dr Ambedkar then entered the parliament as a Rajya Sabha member. He contested by-poll from Bhandara in 1954 to try to enter Lok Sabha but again lost to Mr Borkar of Congress.
  • The very first votes of the election were cast in the tehsil (district) of Chini in Himachal Pradesh.

 

Lets Enjoy Some Pics 🙂

 

Mock election 1951:Delhi

 

Vijay Lakshmi Pandit doing Pre-Election Meet

 

Sukumar Sen 1st Election Commissioner of india,1951

 

Respect _/\_

 

Counting

 

Pic From Delhi

 

Credit :- Internet 🙂